शिव स्तुति

गल माल रुद्र की सोहे शम्भू के, छम-छम कर नाचे त्रिपुरारी,
डमरू की डम-डम ताल मनोहर, नाचे शंकर दे-दे तारी।

शशि से सोहे शिव भाल मनोहर, कटि में पहने है छाल हरिहर,
गल भोले के व्याल फणिधर, त्रिनेत्र से निकले ज्वाल भयंकर।

जाह्नवी शीश सुशोभित होती, करती जटाओं बीच कल्लोल,
धारण भव ने किया गंग को, कैलाश बीच जटाएँ खोल।

आक धतूरे मन भाए भीम के, घुटे भंग गौरस के संग,
बेलपत्र लगते अति प्यारे, राख़ रचाए समूचे अंग।

सर्वज्ञ हो नंदी सवार, निकले करने जब गगन-विहार,
वाम अंग में मात गौरजा, काही जाय नहीं शोभा अपार।

आशुतोष व्यापकता आपकी, नाथ बखानू मैं किस भांति,
दो शक्ति हे आप दयालु, कर पाऊँ विनती दिन-राति।

हे नाथ दिगंबर अरदास करूँ, कर जोड़े मन विश्वास करूँ,
हो आप कृपा के सागर शम्भो, दो अभय, नाथ अरदास करूँ।

………………………………….मनोज चारण
मो. – 9414582964

shanker511

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