चौके से बाहर हुआ, सोने के संग प्याज।

सोने चाँदी की तो बात ही निराली है अब, प्याज भी दूर भाग गया है। मैने टिक्की बताशे वाले से कहा भाई साहब प्याज डाल दीजिये, तो वह कहने लगा कि जान मांग लो मगर प्याज मत मांगो। : Isliye pyaaj ki aatma ki shanti ke liye shraddhasuman pesh hai :

चौके से बाहर हुआ, सोने के संग प्याज।
जनता की हालत खस्ता, भरते-भरते ब्याज।।
भरते-भरते ब्याज, जहाँ भीषण मंहगाई।
ये कैसा है राज, विपदा सभी पर आई।।
कह मोहन कविराय, उनको मिल गये मौके।
पर जनता बेहाल, बर्बाद हो गये चौके।।
– मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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