जिसने मेरे बहार को

जिसने मेरे बहार को पतझड़ बना दिया

कलियों को श्राप दे के पत्थर बना दिया.

 

वो माँगते हैं आज हमसे चमन की खुशबू

तो हमने उन्हें ठूंठ सा तरूवर दिखा दिया.

 

ईर्ष्या की आग में जले जला के वो वतन

तो हमने आस्तीन का अजगर दिखा दिया.

 

कब तक रहेंगे छिप के बने वो छिपा रूस्तम

उसने छिपा के रखा वो ख़ंजर दिखा दिया.

 

है वक़्त ऐसे चेहरे को पहचानिए ज़रुर

गुज़रा ‘सुधाकर’ साथ वो मंज़र दिखा दिया

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