उठा है वक्त के हाथों में

उठा है वक्त के हाथों में ख़ंजर देख रहा हूँ.

जहां उगते थे गेहूं धान बंजर देख रहा हूँ.

 

जहां बहती थी नदियां कलकलाती दूध् सा पानी

वहां है रेत बालू का समन्दर देख रहा हूँ.

 

बिलखती बिलबिलाती है धरा इसको न छेड़ो तुम

धधकती आग सीने में है अन्दर देख रहा हूँ.

 

बने जो कुदरती कानून इसको जब भी छेड़ोगे

ऊगलता आग है सूरज वो ऊपर देख रहा हूँ

 

‘सुधाकर’ वक्त का अजगर विषैला छेड़ने से डर

नहीं तो नाचती है मौत सर पर देख रहा हूँ.

2 Comments

  1. sudhakar ravi 19/10/2013
  2. sudha shree 19/10/2013

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