ये समाज

आडम्बर की जटिलताओं में जटिल होता ये समाज
कर्मो की शिथिलताओ में शिथिल होता ये समाज
राम को पत्थर में ढूंडता सर झुकाता ये समाज
ज्ञान के आभाव में लडखडाता छटपटाता ये समाज
संस्कारों की बाग़ डोर औरत को थमाता ये समाज
द्रोपदी को नग्न देखता सीता को त्यागता ये समाज
कुरीतियों की बेड़ियों में जकड़ा खुद को स्वतंत्र कहता ये समाज
तेरा मेरा मेरा तेरा कर लड़ता झगड़ता ये समाज
आडम्बर की जटिलताओं में जटिल होता ये समाज
कर्मो की शिथिलताओ में शिथिल होता ये समाज

–  अनंत गोवेर्धन (Anant Gowerdhan)

 

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