गँगा तो मैली है

संगम घाट
संगम घाट
मिलन त्रिवेणी का साक्षी
गंगा का तो वेग प्रचंड
यमुना बहती शीतल शीतल
मन की आँखों से झाँको
सरस्वती माता
लोक कथा; सदियों से चलती आई ।

संगम घाट मैं खड़ा
सोचू टक टकी लगाए
जो भी दिखता आता आता
डुबकी लगाए
हर हर गंगे कहता जाता ।

इतने में इक पाण्डा आया
पूजा सामग्री पाँच नारियल
थाली में धर लाया ।

मुझसे बोल-
पूजा करवा लो।
मैंने भी हाँ कर दी।
फिर बोला – डुबकी लगा लो, कर्म किए पाप मिटा लो ।

ज्यूँ ही चारों ओर नज़र घुमाई
श्रेष्ठ खुद को कहने वालों की
फैंकी गंदगी नज़र आई ।

अंसमज़स में था खड़ा
पाण्डा फिर से बोल पड़ा
मन में था उठा इक प्रश्न
सो मैं भी बोल पड़ा :

“मेरे पापों का गठड़ा बहुत भारी है
गंगा तो पहले से मैली है
न इसमें डुबकी लगाऊँगा
पहले ही कर्ज़ में डूबा हूँ
फ़िर कैसे इसका कर्ज़ चुकाऊँगा?”

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