बनते है

बोलते झूठ जो हरदम वो हरिश्चन्द्र बनते है |
घोलकर जहर को दिल में सुधाकर चन्द्र बनते है ||
जानते थे जानते है जानकर भी है अनजाने |
दर्द की बाढ़ जब आये तो कविता छंद बनते है ||

बेदना देख कर मेरी वो आनंद कंद बनते है |
ह्रदय की आहुती देकर वो परमानन्द बनते है ||
प्रलय की बाढ़ सरिता बन प्रेम नौका में उफनाई |
डुबोकर बीच धारा में सच्चिदानंद बनते है ||

सत्य जो हम कहें तो वो मानस द्वन्द बनते है |
न सुलझा है न सुलझेगा वो ऐसे फ़न्द बनते है ||
प्रेम आराधना करके मर्म मुझको मिला है ये |
भ्रमर संगीत को सुनकर वो रस मकरंद बनते है ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी

Leave a Reply