अभुक्त मूल नक्षत्र विचार एवम फल

आश्लेखा जेष्ठा मूल की संज्ञा है अतिगंड |
मघा अश्वनी रेवती को कहते उपगंड ||

ज्येष्ठा अंतिम आद्य मूल द्वै | घटी कहावै अभुक्त मूलमय |
चरण अश्वनी प्रथम जन्म हो| पिता कष्ट या पिता मरण हो ||
दूसर तीसर चतुर्थ चरणा |सब सुख होय सर्व दुःख हरणा ||
ज्येष्ठा पूर्ण अरिष्ट बखाना |सकल कुटुम्ब कष्टमय माना ||
रेवति तीनि चरण सुखकारी |अंतिम चरण सर्व सुखहारी ||
आश्लेखा प्रथम चरण नहिं दोषा |अंतिम चरण हानि अरु रोषा ||
तीसर मातृ कष्टमय माना |चतुर्थ पिता अरिष्ट बखाना ||

Leave a Reply