गीत

वेदनाओं के चरम में, जो हृदय से स्वर निकलते,
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते|

है जगत की रीत कासी?
भावना हो रही बासी|
पर हृदय की पीर साँची,
गीत में गुंथ मुस्कुराती|
जब हृदय में वेदना से, शब्द झर-झर के निकलते,
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते||१||

सघन हो कितना अँधेरा,
तिमिर ने भी मार्ग घेरा|
गीत ऐसे पथ दिखाए,
रात्रि में जैसे सवेरा|
छन्द के इन बन्धनों में, चेतना के स्वर मुखरते|
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते||२||

–दीपक श्रीवास्तव

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