तो जिंदगानी किसी काम की नहीं

कल्पना में चाहे जितनी हो उंचाई, पर अफ़साने में न हो ज़रा भी गहराई,
तो कहानी किसी काम की नहीं I
तोहफे जितने मिले हों मोहब्बत में, पर काम न आयें ज़रा भी ग़ुरबत में,
तो निशानी किसी काम की नहीं I
इश्क चाहे जितना किसी से करते हों, पर वादे निभाने से अक्सर डरते हों,
तो जवानी किसी काम की नहीं I
जीवन जीने की चाहे जितनी हो कामना, पर देश प्रेम न हो ज़रा भी भावना,
तो जिंदगानी किसी काम की नहीं II

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गुरचरन मेहता  

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