गंगा महिमा

आह! कहें क्या तुझे भगीरथ इसी लिये धरती पर लाये,
युग -युग तक मानव का दु:ख सहती ही जाये।
मानव को तरने को पुनर्जन्म ना धरने को,
गंगोत्री से चले तुझको ले अपने साथ।
जगह-जगह रुक जाते मन में लेकर आस,
खुद तो विश्र्शाम करें तू हाहाकार मचाती।
नींद ना आये सो न सकी कितने हुये बेदर्दी,
तेरे अविरल धाराओं का नहीं रहा आभास।
उत्तर-दક્ષિण पूरब-पश्चिम ले जाते थे वे,
तू ना पूछती थी उनसे कितना तुझको मोड़ेगे।
गावों नगरो शहरों कितनी धारावो से जोड़ेगे,
नीचे ऊँचे पर्वत खाड़ी समतल करने का काम दिया।
गड़ी सड़ी व पड़ी लाश को तरने का काम लिया ,
उजड़ी बस्ती ऊँचे नीचे पापी का तू साथ दिया।
जितने पापी आये धरती पर हरने का काम किया ,
नर नारी बच्चे-बच्ची मठाधीश पीताम्बर धारी।
वे निर्जन से ही ले जाते थे धनवानो के बीच ,
खोई-खोई अबिरल लट जनमानस रही समेट।
इससे भी जब नही अघाये दिया शम्भु को भेंट,
काग भुसुन्डी बत्तख तीतर गौरये ने पान किया ।
भैस गाय हाथी ऊटो ने समय पाय अपमान किया,
सांप और बिच्छू गोजर ने समय-समय पे पिया।
कुत्ता बिल्ली खरगोशो ने समय-समय पे छेड़ा,
ज्यों-ज्यों बढ़ती चली तू निर्मल मैले तुझे किये हैं।
काना कोढ़ी लंगड़ लोभी भी आते तेरे पास,
राजा योगी भोगी भी तुमसे करते फिरते प्यार।
सुन्दरियो के भोग काल में भूपति तेरे साथ,
बड़े-बड़े राजर्षि राजे भी चूसे तुझको आय ।
नाम पे तेरे ठग विद्या करते रहेंगे लोग,
गमगीनी में नहीं तूने किया कभी भी सोच।
इतने से भी नहीं अघाये लिया है तेरा नीर,
जब- जब किया परीछ्ण निकला निर्मल नीर ।
जब विवेक से मानव तुझको कुछ देना चाहा,
भावातुर होकर उसने पुष्प दीप ही ढाया।
स्वर्ग लोक से लाकर तुझको करते सभी मान,
ईंट पत्थरों से मानव करता आया सम्मान।
जन्म मृत्यु का भय उन्हें जब बहुत सताये ,
हाड़ मांस बचे जो उनसे तुझमें ला बहाये।
राम नाम का सत्य कह दावानल दहकाये,
ता पर भी संतोष नहीं दरिया में डहकाये।
जगह-जगह ऊपर तेरे पुल का निर्माण किया,
ईंट पत्थरो से समय समय तेरा अपमान किया।
नाले नलकूपों से तेरा शोषण किये निचोड़े,
मित्र मंडली ने भी तुझको बार बार झकझोरे।
तेरे तट पर विषय हस्तिनी ने भी किया रहना,
पा ना सकी जीवों का सुख केवल दु:ख सहना?
ढोल मजीरे और नगाड़े शहनाई कीआहट तासा!
विद्वत जन भी नहीँ छोड़े गाये अविरल गाथा।
तट पर तेरे वृच्छों में लदे फूले फलो के ढेर,
होगी आशा तेरी भी खायेगे मां हम बेर।
तूने मां इस लोक में किया बहुत अन्वेषण,
जन-जन मिल जुल किये तुम्हारा शोषण ।
कभी तो उन पर सोच गंगे जिसने दर्द दिये ,
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सबने तुझे पिये ।
साधु संत मौलवि मुल्ला कठ मुल्लाओं को सहते जा,
तूने प्रण का किया पालन मंगल धन्य कहते जा।।

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