तंद्रा

जब कभी भी शहर में मै बाहर आता यार।
चील कौआ मुजिरिमो क़ा अदालत दिख जाता॥
जऩता जरजर जग जाहिर हाला हलाहल पी पीकर।
भहरात फहरात हहरात ढ़हनात गते सार ॥
कमनीय कला कामना कोमल तंद्रा तारतार।
भ्रष्टाचार ब्भिचार वलात्कार बलासे खिल जाता॥
बोझिल वालायेंबड़कन बकवाश बहार।
अनगित अंगार झंझार भंभार धूआधार ॥
लंपट चंचल थहरत कुस काश अधियार ।
चमचमाती चूड़ियॉ कलाइयॉ बेजार ॥
मँगल मनमोहक मुक्ता मचली मनुहार ।
सो संवादों से संसद सिहरत सरमसार ॥
तरनि तरल तरंग तप्त जग मेंआग जलाकर ।
कलकल छलछल छवि छनती छनछन छनकर॥
झरझर झरझर झरते निर्झर अगनित हार ।
जब कभी भी शहर में मै बाहर आता यार ॥

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