गजल

एक बचपन का जमाना था,
जिसमे खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने कि थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबह क़ी
ना शाम का ठिकाना था..
थककर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था…
माँ कि कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था..
क्यों हो गए हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था.

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