शाकी और शराब‏

शाकी ने तोड़ दिया रिश्ता शराब से रिश्ता लगाली मैंने
महफिल से उठा घर अपना शराबखाने मे बसाली मैंने
परवाने तो मडराएंगे ही जहां शमा फिर जलेंगे
जले हुए दिल को अपनी शराब से बुझाली मैंने
बोतल मे भरी शराब की औकाद ही क्या है यारों
देखना था रंग उसकी तो हलक मे उतारली मैंने
शराबी न हो महफिल मे तो शाकी का रंग क्या हो ?
रूठे हुए शाकी को शराब पिके मनाली मैंने
चुपके से आते महफिल मे आबरू बचाकर अन्दर
खुलयाम मै बहकता आबरू उतारली मैंने
हरि पौडेल

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