मेरा बस्ता…….

             मेरा   बस्ता

 यादो  को  टटोलता  पूछे  मेरा  बस्ता ,

अब  तो  अरसा  बीता,  गए  मुझे  तेरी  पाठशाला .

 लेकर  गए   मुझे  तुम   हर एक   ओर

 सुन  भी  चूका  अब   वो  अनसुनी  शोर ,

 अब  तो  देख   भी  ली   मैंने   तेरी  मधुशाला  ,

 पर  आता   क्यों    न    नजर    वो   तेरी  पाठशाला .

 वो   किताबो   को  समेटकर   चढ़ना    तेरी  पीठपर  ,

 वो   ट्रिन  ट्रिन    करती साइकिल    और     सकरी   गलियों  का   सफ़र.

 हर  मोड़   पर  जनमता  एक  नया  प्रश्न  मन  के   अंदर ,

 और  यही  दिखने  में  रहते, किसका  बस्ता  है  बेहतर.

 गाती  हवाओं  से  मुकाबला  कर  जानने  उन  प्रश्नों  का  उत्तर,

 चमक  नजर की  खील   जाती , जब  करते  प्रवेश  उस  मंदिर  क  अंदर.

 खोलकर   तोड़कर  मन    के   अंदर   का   हर   ताला,

बस   चला   करते   उस   ओर  जहा  थी  अपनी  पाठशाला .

 अब  यही   पूछे  मेरा  बस्ता, क्यों  छुटा   वो  पुराना  रास्ता,

 तू   गया   लेकर  मुझे  हर  एक  शाला ,पर  आता   न   नजर  अब वो  अपनी    पाठशाला .

 यादो  को   टटोलता  पूछे  मेरा  बस्ता

 अब  तो  अरसा  बीता,  गए  मुझे  तेरी  पाठशाला .

 

नितेश  सिंह  (कुमार  आदित्य)

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