क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है

न्याय की पोथी के वो पन्ने सुलगा रहे थे
पूछा क्यों ?तो बोले चुनाव जो आ रहे हैं

इत्मीनान से कर रहे थे वो कश्ती में सुराख
नाव जब डूबी तो दोष जमाने पर मढ़ दिया

सफेद बगुला तो नव निर्माण की बात करता है
मगर समन्दर की मछलियाँ क्यों रोने लगी है

बड़ी जालिम है निरपेक्षता धर्म के नाम पर
मरहम की बात करके वो चीरा लगा देते हैं

कंठी,माला,टोपी सडको पर क्यों अटी पड़ी है
लगता है- जरुर कोई नेता इधर से गुजरा है

आज उसकी झोपडी में चूल्हा जला कैसे
क्या फिर कोई धूर्त सन्यासी बन आया है

वो दुश्मन से गले मिलकर अमन का ख़्वाब देखते हैं
हकीकत सिर्फ यही थी कोई जवान शहीद हुआ है

क्यों उदास है आज ये गुलजार गुलिस्ता
क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है

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