एकला चलो रे (चल अकेला रे)

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे
तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले
यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे
तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू हृदय पंजर चला और जल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

– रवीन्द्रनाथ टैगोर (सितम्बर   1905)

नोट: यह बंगाल का एक सुप्रसिद्ध गीत है|  यह कविता मूल रूप से बांगला भाषा में लिखी गई है जिसका ये हिंदी अनुवाद है|  फिल्म ‘कहानी’ में ‘अमिताभ बच्चन’ की आवाज़ में यह गीत बांगला और हिंदी मिश्रित भाषा में गाया गया था, जिसके अंतरे में इस पुरे गीत का सार निकल आता है| जो इस प्रकार है:

जब काली  घटा छाए,
ओरे ओ रे ओ अँधेरा सच को निगल जाये
जब दुनिया सारी, डर के आगे सर अपना झुकाए,
तू शोला बन्जा, वो शोला बन्जा, जो खुद जल के जहाँ रौशन करदे,
एकला जलो रे.

जोदि तोर दक सुने केउ ना अशे,
तोबे एकला चोलो, एकला चलो, एकला चलो रे,
एकला चोलो रे,

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