छोटी कविताऐ

एहतियाते – नजर को क्या
कहिये जनाब
नजर मिलाते है वो
नजर बचIते हुऐ
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तुम्हे देखते ही
उलझने बढ जाती है मेरी
उलझने सुलझाने मे
तुम ना मेरी मदद करो
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मै क्युं कहूं उन्से
मुझे प्यार हो गया है
जो जान बुझ कर मेरे
जज़्बात से खेलें
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मिलते है बडे हंस हंस कर
वो मेरे रक़ीब से
प्यार उन्हे उनसे हो गया है
या मुझे जलाते है वो
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हाथो के खाली होने से
दिल खाली नही होते
कभी मांग कर तो देखिये
इस दिल से हमारे
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जिन्दगी भर सताएगी
ये खुशि मुझको
प्यार किया था तुमने कभी
मुझे अपना बनाकर
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मेरी जिन्दगी मे
जो तु मेरे साथ है
तभी जिन्दगी है वो
वर्ना तो काली रात है
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दिल टूट कर बिखर गया
शिशो के टुकडो सा
हर टुकडे मे तुम्हरी
सुरत बसी हुई
नाराज़ हो तुम क्युं
वफ़ाओ से मेरी
कहो तो जान दे दूं
मै नाम पर तुम्हारे
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