भुंजे तीतर सा मेरा मन

भुंजे तीतर सा मेरा मन 

वक्त की सलीब चढ़ता ही नहीं 

 

कोई आमरस जिह्वा पर 

स्वाद अंकित करता ही नहीं 

 

ये किन पैरहनों के मौसम हैं 

जिनमे कोई झरना अब झरता ही नहीं 

 

मैं उम्र की फसल काटती रही 

मगर ब्याज है कि चुकता ही  नहीं 

 

खुद से लडती हूँ बेवजह रोज ही 

मगर सुलह का कोई दर दिखता ही नहीं 

 

 

One Response

  1. mukesh bajpai 06/10/2013

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