सुख दुःख दोनों रहते जिसमे – कभी धुप कभी छाँव (1965)

सुख दुःख दोनों रहते जिसमे
जीवन है वो गाँव
कभी धुप कभी छाँव
कभी धुप तो कभी छाँव
कभी धुप कभी छाँव
कभी धुप तो कभी छाँव

भले भी दिन आते जगत में
बुरे भी दिन आते
कड़वे मीठे फल करम के
यहाँ सभी पते
कभी सीधे कभी उलटे पड़ते
अजब समय के पाँव
कभी धुप कभी छाँव
कभी धुप तो कभी छाँव

क्या खुशियाँ क्या गम
ये सब मिलते बारी बारी
मालिक की मर्ज़ी पे चलती ये दुनिया सारी
ध्यान से खेना जग में बन्दे
अपनी नाव
कभी धुप कभी छाँव
कभी धुप तो कभी छाँव

– प्रदीप

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