कितना बदल गया इंसान – नास्तिक (1954)

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भग्वान
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान
सूरज ना बदला , चाँद ना बदला , ना बदला रे आसमान
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान

आया समय बड़ा बेढंगा
आज आदमी बना लफंगा
कहीं पे झगड़ा कहीं पे दंगा
नाच रहा नर , हो कर नंगा
छल और कपट के हाथों अपना
बेच रहा ईमान ,
कितना बदल गया इंसान …..

राम के भक्त , रहीम के बन्दे
रचते आज , फ़रेब के फंदे
कितने ये मक्कार ये अंधे
देख लिए इन के भी धंधे
इन्हीं की काली करतूतों से
हुवा ये मुल्क मशान ,
कितना बदल गया इंसान ….

जो हम आपस में ना झगड़ते
बने हुए क्यों खेल बिगड़ते
काहे लाखों घर ये उजड़ते
क्यों ये बच्चे माँ से बिछड़ते
फूट-फूट कर क्यों रोते
प्यारे बापू के प्राण ,
कितना बदल गया इंसान ………..

–  प्रदीप  (कवी)

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