नीम की पत्तियाँ

बहुत निभा ली यारी हमने चलो अब ये झूठा रिश्ता निभा लूँ,
झूठ कह कर जो कहो तो सच की तरह ही मैं भी सिर उठा लूँ ?

जो न समझो तुम बात मेरी तो क्या इसमें भी कसूर मेरा है,
अब लोगों की तरह मैं भी जाकर ओलों में क्या सर मुण्डा लूँ ?

जो हो गया सो हो गया अब क्या रोना और क्या पछताना,
ज़ख्मों को कुरेद कुरेद कर अब क्या मैं उसे नासूर बना लूँ ?

बिना किसी शर्त के मानी है हर बात हमने तुम्हारी अब तक,
गलती की नहीं फिर भी तुम चाहो तो अपनी नज़रें झुका लूँ I

चोट गहरी है, ज़रा वक़्त लगेगा चेहरे पर मुस्कराहट आने में,
चाहने से तुम्हारे खोखली हंसी का क्या मैं भी ठहाका लगा लूँ ?

दिल में बस कर अपना बनकर अपनों ने ही तोड़ा है दिल,
दिल तो चाहता है एक बार से फिर दिल की बाज़ी लगा लूँ I

लिखा रहने दो किताबों में कि सच कहता है आइना हमेशा,
दिल करता है सच्चाई के नाम पर नीम की पत्तियाँ चबा लूँ I
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गुरचरन मेह्ता

6 Comments

  1. nareshkavi nareshkavi 09/10/2013
    • Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 12/10/2013
  2. manoj charan Manoj Charan 09/10/2013
    • Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 12/10/2013
  3. Deepak Srivastava Deepak Srivastava 09/10/2013
    • Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 12/10/2013

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