सियासत की गली गन्दी

सियासत की गली गन्दी उसे अब साफ़ करना है |
गरीबों और लाचारों का अब इन्साफ करना है ||
जकड़न बाज पंजे की असह्य पीड़ा बनी अब तक |
मरण अब बाज का निश्चित नहीं अब माफ़ करना है ||

हरण कितना किया धन का वो काला धन मगायेंगे |
अब इन बाज पंजों पर हथौड़ा भी चलायेगें ||
समय उन पर मेहरबाँ था तो सीता हरण कर लाये |
समय अब राम का आया तो रावण को मिटायेंगे ||

अन्ना और बाबा की सियासत से ठन चुकी है |
घननाद रावण की मृत्यु लंका बन चुकी है ||
कभी लंका की शक्ती से बाबा थे हुए मूर्क्षित |
अमर संजीवनी शक्ती अब उन में जन चुकी है ||

युद्ध हो धर्म का या फिर अधर्मी ज्वाल बन जायें |
अब नर इन्द्र के मेघा गगन पर है हुए छाये ||
अस्त्र कोई चले घननाद का तो अब न कुछ होगा |
लक्ष्मण की जगह पर अब दो यती युद्ध को आये ||

ज्यादा अब कहें क्या हम गम का मातम ढल चुका है |
अटल वो सुर्य पूरब में सुभाषित हो खिल चुका है ||
रात्रि के आगमन से जो कँवल दल बंद थे अब तक |
उन्हें नर इन्द्र सर में अब सूर्य दर्शन मिल चुका है ||

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