मत लेना

किसी टूटे हुए दिल की कभी भी आह मत लेना |
समन्दर है बहुत गहरा कभी भी थाह मत लेना ||
बादल पीर बनकर जब किसी गिरि पर बरसता है |
वो बदरीनाथ मंजर की कभी तुम चाह मत लेना ||

किसी भावुक ह्रदय की भावना का भाव मत लेना |
वृक्ष जो सूख सकता हो उसकी छाँव मत लेना ||
बिकता तो बहुत कुछ है मगर सब कुछ नहीं बिकता |
ह्रदय की चाह मत लेना, ह्रदय की थाह मत लेना ||

असह्य हो पीर पर्वत की तो उसको तोल मत लेना |
ज्वाला हो जो पर्वत में उसको खोल मत लेना ||
ज्वाल पर्वत की फटती है उलटती है पलटती है |
ज्वाला के ह्रदय का अब खिलौना मोल मत लेना ||

बुलंदी है नहीं कोई जिसे हम पा नहीं सकते |
शहंशाह है नहीं ऐसे जिन्हें लुटवा नहीं सकते ||
लुटेरे से वो रत्नाकर बने थे आदि कवि कोविद |
विवश है हम लुटेरे बन के कविता गा नहीं सकते ||

ये कवियों की अमर वाणी चराचर को झुका सकती |
वो लवकुश बल पराक्रम को है फिर से दिखा सकती ||
कनक मद में जो फूले हो तो ये भी समझ लेना तुम|
कनकस्त्रोत बन कविता कनक वर्षा करा सकती ||

2 Comments

  1. Muskaan 27/09/2013

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