दो बातें

दो बातें सदा तुम्हारी
जान लेती रही हमारी 
दोस्ती भी बता रहे हो
दुश्मनी भी जाता रहे हो 
कह के दिल से तुम हमको अपना
कैसा रिश्ता निभा रहे हो 

हम अगर नादाँ होते 
बातें तुम्हारी दिल पे न लेते
कभी मोहबत का इज़हार कर दो
कभी मोहबत से इनकार कर दो 
जला के दीप उम्मीद का तुम 
किसी का घर क्यूँ जला रहे हो 

तुम कभी महफ़िल में अपनी 
परिचय हमारा करा रहे हो 
और कभी बेगानों की तरह 
हमसे नज़रे चुरा रहे हो 
जो तुम्हारी है ये अदाएं 
ये वफ़ा हे या बेफवायें

अजय डबराल

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