ओस में नहायी औरतें

ओस में भीगी औरत
औरत नही होती
होती है तो उस वक्त
सिर्फ़ एक नवांगना
तरुणाई मे अलसाई
कोई धवल धवल
चाँदनी की किरण
अपने प्रकाश से प्रकाशित करती
सृष्टि के स्पंदनों का
एक नव उपादानों का
सृजन करती हुयी
मगर क्षण भंगुरता है
उसका ये जीवन
ओस कितनी देर ठहरती है पत्तों पर
बस एक ताप ………और वाष्पित होना
उसकी नियति …………
मगर ओस में नहायी औरतें नहीं होतीं वाष्पित
गंध महकती है उनके पसीने से भी
वाष्पीकरण फ़ैला जाता है हवा में हर कण
ओस मे नहायी औरतों का …………
और बन जाता है इंद्रधनुष
बिना बारिश और बिना धूप के …………
ओस मे नहायी औरतों के इन्द्रधनुष उम्र भर महका करते हैं …………यादों में गुलाब बनकर

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