रात बिन चाँद की

रात बिन चाँद की चाँद बिन चांदनी,चांदनी में न हो जैसे अब रोशनी |
आपके बिन हमारी यही है दशा ,नृत्य हो मोर का जैसे बिन मोरनी ||

छाँव बिन बाग़ की लय हो बिन राग की हो मिलन जैसे कोई बिना फाग की |
आपके बिन हमे ऐसा क्या हो गया ,दिखी होली हमें बिना रंग राग की ||

दीप बिन तेल के दोस्त बिन मेल के ,हो मैदान जैसे बिना खेल के |
आपके बिन तो हम ऐसे मायूस हैं ,चाँद जैसे उगा बिन नखत बेल के ||

सप्त सुर साधना बिन संगीत की ,आरती अर्चना जैसे बिन गीत की |
आपके बिन हमें सब कुछ नीरस लगा,प्रार्थना वंदना जैसे बिन प्रीत की ||

मूर्ति बिन रूप के सर्दी बिन धूप के,राज्य कोई लुटा जैसे बिन भूप के |
आपके बिन हमारा तो सब कुछ गया ,झुलसा दिल गुल हो जैसे बिना धूप के ||

ख्वाब बिन आस के आस बिन श्वास के ,नृत्य हो कृष्ण का जैसे बिन राँस के |
आपके बिन हमें क्या हुआ है प्रिये, जीवन जीता हूँ जैसे बिना श्वास के ||

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