वक्त

वक्त! वक्त छौड़ता नहीं किसी को।
मोड़ देता है शालार जी रहे जवानो को।
तोड़ देता मै भंग भरे इन्सानो को।
फोड़ देता अहम् लिये हैवान को।।
वक्त का सत्व सीता हुईं बेहाल थीं।
अशोक मे रहीं उनकी ही चाल थी।
वक्त की निर्दयता पार्वती हुईं विह्वल।
वक्त का दबाव विश्वामित्र हुये चंचल।।
कल तक रहे जो देव!
हैवान वन जीते सगरी।
माया रूपी नगरी,शैतान बन जीते डगरी।
अपना सब सपना यहां!
वक्त सब को है मारा।
मत कहो वक्त ने मुझे मारा।
वक्त भूखे दिलो का पुच्छल तारा।।
हे वक्त तू बता यहां ।।
मंजिल हमारी तू कहां।
से सारी साया सजा,
सेज तू सजा सजग हो यहां।
बारात बहु लगी जहां।
बारात तू दिखा हमे भी वहां।
कल कहां रहेगे हम सभी जहां।
जी से बता हमें तू समा-समा।
विष पिया था शम्भु ने ?
अमृत हुआ था वक्त से।
वक्त!ऋषि मुनियो को,
नहीं कभी भी छोड़ा।
वक्त ने व्रह्माको,
प्रभु की तरफ मोड़ा।
——–
वक्त ने अर्जुन के,
मय को है तोड़ा।
वक्त ने कंश का,
विनाश कर ही छोड़ा।
वक्त ने सपरिजन ,
रावण को ना छोड़ा।
वक्त ही तो है जो,
परिवेष को निचोड़ा।
वक्त ही है आज जो,
शाश्वत कर वेद से जोड़ा।
वक्त ने कागा को भी मोड़ा।
शंक युक्त जो थोड़ा-थोड़ा।।
गरुण पड़े विषमय मे,
वक्त ने अंडे को छोड़ा?
कागा ने सुन लिया ।
वक्त का चमत्कार पार्वती,
सो गयीं मिला नहीं अमरत्व।
नहीं लोभ है सुनो वक्त,
अब जीवन जग में जीने को?
शिष से सनकी कट रहा वक्त?
सुनो वही अब चलने को,
सन्तप्त!!
चक्की मे पिसवा दो ऐसे ,
जैसे आटा पिसता वैसे
वा! चक्की मे दरवा दो वैसे,
दाल अरहर की दरती जैसे।
बेर चबा कर खाते जैसे,
व्याघ्र से चबवाओ वैसे।
निर्दय बनकर वक्त तू ऐसे ,
वल्लम-वल्लम चुभवाओ भय से।
नाला नाली कीचड़ वैसे,
जैसे चाहो ले चलो वक्त।
लाठी डन्डा बातो मे,
हमेंना भरमाओ शक्त।
मृत्यु लोक से ऊब चुका,
चुभन बहुत भरमाया संसय।
सुख दु:ख तूने दिया सक्त,
हमने सहा बन भक्त।
शाश्त्र मे कहते का हो,
सब कोई अपना है यहां।।
अपने सपने बनकर,
दावानल दहते हैं जहां

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