पुकार

उठो बहादुर उठो,
समर सुनशान पड़ा है ।
लुटते देखी मां की लाज,
बलिदानी बलिदान खड़ा है ।
उठो बहादुर उठो-2 ॥
कुर्बानी की जंग है लड़नी,
दुश्मन तो ललकार रहा है ।
फौलादी जंगी बेड़ा को,
तुम भी तो तैयार करो ?
अड़ा है——–
उठो बहादुर उठो ।।
खड़ा शहीदी जत्था भी,
तुमको आज पुकार रहा है ।
त्याग तपस्या बलिदानों का,
यहीं रहा है केन्द्र बिन्दु,
मंगल आज पुकार रहा है ।
उठो बहादुर उठो —-॥
चारो तरफ बिछी देख,
लाशों की जब ढेर,
झुकने देना कभी ना अब,
भारत माँ का शीश ।
उठो बहादुर उठो ।।
तपो भूमि हर ग्राम हमारे,
कवि की वाणी गाती है,
लोरी गाती साम को माता,
गाय हमारीप्यारी है।
कहाँ सिंह बने खिलौने,
बलिदानी बलिदान खड़ा है।
उठो बहादुर उठो ।।

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