नैनो में आन परा

समय के झंझावत से झरा

एक टुकड़ा  में आन परा ,

बसा रहा वही बीते वर्ष कई ,

आई गयी ऋतुए,ज्यू झाड़ जई

बसा रहा किन्तु कोपलो की ओट

घेरे संरक्षित मेरी पलक परकोट

जीवन डगर का व़ह मनोरम मोड़

बढ गयी थी आगे निर्मम जिसको छोड़

बही तो थी कई बार आंखो से धारा ,

ना जाने किन्तु उसे था किसका सहारा

किंकर सा रहा वही साथ व़ह मेरे

बना दिलासा जब जब थे विषाद घेरे

मन दर्पण में फिर छलकी व़ह छाया

आज हाए विधि की कैसी माया

फिर भेद रहा तन मेरा स्वर्ण पिंजर,

भवन बने फिर अकुलाया –खंडहर

समा गये युग इन्ही बाधाओ को अर्पण

फिर साल रहा क्यू  आज ,, हर क्षण,

अब शेष नहीं भादो बीत गया सावन

फिर पतझार में क्यू भ्रमर सा तरसा मन

आज नहीं बसंत न नक्षत्र स्वाती

फिर घेरे क्यू अनदेखे स्वपनो के थाती,

केह्ता क्यू मन जी ले फिर वो ही पल ,

महका ले हृदय पुष्‍प परिमल

क्यू कह रहा चित खोल लू साँकल,

भर लू मानक मोती से अपनी छागल ,

बांधू फिर थिरकते पांवो में पायल

दू मुरझाये पंखो को फिर समीर अविरल

लगा रहा मन प्रतिपल अब ये कयास

कहां गया रीतापन कहां गए उच्छ्वास

क्यों बिखरी स्मितहास कल जहा थी सिसिकि

चाहत है किसकी अबोध ? मेरी या उस कण की ?(2)

2 Comments

  1. Deepak Nambiar Deepak Nambiar 22/09/2013
    • smita 23/09/2013

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