खरोच

यादो कि खरोच थी केवल ,न जाने कुरेदा क्यू हमने
समय सारंग की इक लहर ,,अनायास, छेडा  क्यू हमने
ग्यात नही था शेष रह गये,अनुभुति के रेशे, झिलमिल
बोध नही था बचा, जीवन मे,मुझको अभी जलना तिलतिल
बांध लिये थे भाव सभी जब,और सदियों रही ,किनारे बैठ
बीती ॠतु को पाने फिर क्यू,गई बावरी ,गहरे पानी पैठ
दौड़ पड़े क्यू पांव थिरककर,सुनी नही झंझावात, हुंकार
क्यू बनी ग्यान पापी , मै हाय, इक ओर सांकल इक कारागार
एक टीस उठी एक प्यास जगी,उड गया मन मूरख़ सब बिसरा
मोती बन अवसादो का केवल,भावना मेघ ,चक्षुओ मे ठ्हरा
चक्र काल का घुमा सके जो,सम्बल मनव को मिला नही
फिर क्यु चाह उठी मै दुर्बल,वह जो भाग्य मे लिखा नही
फिर क्यु चाह उठी मै दुर्बल,वह जो भाग्य मे लिखा नही….

Leave a Reply