माँ

माँ

यह जीवन का कड़वा सच है                                 

सब को संसार छोड़ कर जाना है  

मेरी माँ को भी छोड़ कर जाना पड़ा 

मुझे सूनापन  सहना पड़ा   

घर का हर कोना उसकी याद दिलाता है

घर की हर वस्तु में उसकी सुवास है

 कोई आवाज़ उसके पैरों की आहट लगती है

 हवा के झोंके में उसके सांसो की धड़कन है

रात को जब नींद नहीं आती है 

उसकी मुलायम गोदी की याद आती है

मेरी आँखे घर में उसको ढूंढती हैं

मन नहीं मानता कि वह अब नहीं है

मैंने माँ को अच्छी तरह समझा है 

उसकी सहनशीलता को परखा है 

कभी- कभी उसको तड़पते भी देखा है 

उसके बिना जीवन अधूरा लगता है 

उसके लाड-प्यार में जीवन बिताया है

 पीपल की घनी छाया को पाया है 

उसने  जो  मुझे  शिक्षा  दी  है  

उसके ऋण को कैसे भी चुकाना है

 मैंने उसके दिल को कभी दुखाया होगा

शायद उसको कभी रूलाया भी होगा   

पर उसने मुझे  अवश्य  क्षमा किया होगा  

मेरा मार्ग दर्शन  भी  किया होगा   

इसी लिए मुझे माँ से बहुत प्यार है     

उसको भुला पाना अति कठिन है      

मुझे उसकी हर सज़ा स्वीकार है           

मातृदिवस पर मुझे माँ को शीश झुकाना है  |

संतोष गुलाटी   –20/09/2013

 

 

 

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