माँ का घर

देखे थे कुछ सपने

माँ के घर में अपने

सपनों में थी नदियाँ

सपनों में थी कविता

 

जैसे ही छूटा माँ का घर

न जाने कहाँ खो गए सपने!

नदियाँ, पेड़, हवा और बारिश

पहले जैसे कहाँ रहे अब!

 

सपनों की बातें बचकानी

नहीं मिलती अब कविता पे थपकी

 

माँ के घर का अर्थ समझ में आया तबसे

अर्थ हुआ जीने का मकसद जबसे

सपने छूट गए आँखों से

भावों से छूट रही है कविता।

 

आस्था नवल

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  1. PARMANAND 27/02/2014

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