विदेश में बेटियाँ

मेरे घर रोज़ आती है एक नन्ही सी चिड़िया

दाना चुगती है, थोड़ा वरांडे में मटकती है

किसी की आहट सुन  फुर्र से उड़ जाती है।

 

कई बार इंतज़ार करती हूँ उसका

पर वो मेरे रहते कभी आती ही नहीं

जब जब मैं छिप छिप कर उसे देखती हूँ

मुग्द होती हूँ उसपे

मुझे खुद में मेरी माँ नज़र आती है

 

वो भी तो देखती थी

अपनी दोनों चिड़ियों को ऐसे ही मुग्द होकर

जो फुर्र से उड़ गईं हैं उसके आंगन से।

 

आस्था नवल

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