बसंत

मोर की आवाज़ सुनाई देने लगी है

कोयल भी धीरे धीरे

बौर आए आम के वृक्ष पर आने लगी है

शहतूत का पेड़ पहले जैसा फिर से

नए पत्तों के साथ हरा हो गया है

ठंडी बयार के सुस्त होने से काँच की खिड़कियाँ

फिर से खुलने लगी हैं

सुनाई देने लगी हैं पड़ोसी नानी की आवाज़ें

रिश्तों में आई शीतलता भी

खिड़कियाँ खुलने से खत्म हो गई है

कितना अच्छा हो अगर न हो फिर से

सर्दियों का सा शीत जमाव

और न पड़े इतनी अधिक गर्मी

कि लग ही जाए आग

न हो ऐसी वर्षा कि हर पहचान धुल जाए

क्या तुम रिश्तों में हमेशा नही रह सकते बसंत?

————————————————————–आस्था नवल

3 Comments

  1. admin चन्द्र भूषण सिंह 20/09/2013
  2. Praveen Singh 22/09/2013

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