लड़की आज भी

बरसते पानी को देख हुई हर्षित मैं

मन में उठीं सागर की सी हिलोरें

चाह उठी वृक्षों के साथ झूमने की

वर्षा की बूंदों को छूने के लिए

जैसे ही खिड़की खोली

वे सारी बूंदे मेरी ही आँखों से बह निकलीं

सारा हर्ष सारी हिलोरें छिप गई कहीं

सब कुछ धुंधला सा हो गया

और दिखाई दीं केवल नौ लोहे की आढ़ी सीखचें

जो डाल दी गई हैं खिड़की में सुरक्षा के लिए मेरी

पानी अब भी बरस रहा है

वृक्ष झूम रहे हैं

पंछी चहक रहे हैं

मैं सब कुछ देख रही हॅ

मगर सीखचों के भीतर से

————————————-आस्था नवल

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