उसकी आखें है ही ऐसी

जितना छुपाती है, उससे ज्यादा बोल देती है।
उसकी आखें है ही ऐसी, सारे राज खोल देती है।।

मै चीख चीख कर कहता हूं, किसी की समझ मे नहीं आता।
वो पलको को पढ़ समझ लेते है, न जाने आंखे कैसे बोल देती है।।

मर्द हूं किसी की परवाह नहीं , फिर भी सिर धंसी रह जाती है।
पता नहीं उसकी आंखे मेरे, मर्दानगी को क्या बोल देती है।।

नन्हीं बेटी की शैतानियों पर, अक्सर उसे डांट देता हूं
वो नहीं मै ही रो देता हूं, पता नहीं, प्यारी सी आंखे क्या बोल देती है।।

छिपाकर मां से बहुत कुछ करता हूं, सच मुंह ये निकल ही जाता है।
मां पूछती नहीं कुछ भी,कभी भी, बूढ़ी आंखे न जाने क्या बोल देती है।।

वो कुछ कहती न मै सुनता, पल भर नजर मिलती भर है।
बस, बाते सारी हो जाती है, आंखे कैसे, और क्या बोल देती है।।

जितना छुपाती है, उससे ज्यादा बोल देती है।
उसकी आखें है ही ऐसी, सारे राज खोल देती है।।

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