लंका में हनुमान :

लंका में हनुमान :

श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद

 

हनुमान्‌जी लंका में अशोक वाटिका के जिस पेड़ के नीचे सीता बैठी थी उस पेड़ पर चढ़ गए  और उन्होने  सीताजी के सामने राम चन्द्र जी की अँगूठी जो वो निशानी के तौर पर ले कर आए थे , गिरा दी ।  राम-नाम से अंकित अँगूठी को देख कर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और सोचने लगी की यह अंगूठी ?  उनके मन में अनेक प्रकार के शुभ अशुभ  विचार आने लगे । सीता जी की इस व्याकुलता को जान कर हनुमान्‌जी बोले: हे माता सीता ,मैं श्री रामजी का दूत  हनुमान हूँ। यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्री रामजी ने मुझे आपके लिए यह निशानी स्वरूप दी है।

सीताजी ने पूछा- तुम तो वानर हो , तुम्हारा और राम का क्या साथ ।  

तब हनुमानजी ने राम जी का वानरों से कैसे मिलन हुआ था उसकी कथा कही।

सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह श्री राम का भेजा दूत ही है । उनकी आँखों में आँसू आ गए ।

सीताजी ने कहा-हनुमान्‌! राम–लक्ष्मण कैसे हैं । आँसू पौंछते हुए बोलींराम ने तो मुझे बिलकुल ही भुला दिया !

सीताजी के दुख को जान कर हनुमान्‌जी बोले: हे माता!  श्री राम और लक्ष्मण शरीर से कुशल हैं,  हे माता! अब धीरज धरकर श्री राम का संदेश सुनिए।

हनुमान्‌जी बोले-श्री रामचंद्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है । मन का दुःख कह डालने से कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का रहस्य एक मेरा मन ही जानता है और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है।

प्रभु का संदेश सुनते ही सीता जी पुलकित हो गयी ।

हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ, पर, मुझे प्रभु की आज्ञा नहीं है। अतः हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्री रामचंद्रजी वानरों सहित यहाँ आएँगे और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएँगे।

सीताजी ने कहा- हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान नन्हें-नन्हें से होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान, योद्धा हैं तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतोगे ।

यह सुनकर हनुमान्‌जी ने अपना सुमेरु पर्वत के आकार का अत्यंत विशाल शरीर प्रकट किया जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान्‌ और वीर था। उसे देखकर सीताजी के मन में विश्वास हुआ।

हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया और बोले :-हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है।

हनुमान्‌जी को सुनकर सीताजी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने हनुमान्‌जी को आशीर्वाद दिया –हे पुत्र! तुम अजर- अमर होओ

हनुमान्‌जी ने सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया

हे माता ! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है।

सीताजी ने कहा- हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं।

हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता ! यदि आप ऐतराज न करें तो  भारी योद्धा राक्षसों को तो मैं निबट लूँगा ।  

 

 

हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस, अक्षय कुमार वध और मेघनाद का हनुमान्‌जी को नागपाश में बाँधकर सभा में ले जाना

 

हनुमान्‌जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर सीता जी ने उन्हे इजाजत दे दी । वे बाग में घुस गए। फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे उनमें से कुछ को मार डाला तो कुछ ने जाकर रावण से पुकार की-

एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली। फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को मार कर जमीन पर डाल दिया।

यह सुनकर रावण ने बहुत से योद्धा भेजे। हनुमान्‌जी ने सब राक्षसों को मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गए फिर रावण के पास गए  तो उसने अपने एक पुत्र अक्षयकुमार को भेजा। उसे आते देखकर हनुमान्‌जी ने एक वृक्ष हाथ में लेकर ललकारा और उसे मार डाला।कुछ ने फिर जाकर रावण से पुकार की कि :बंदर बहुत ही बलवान्‌ है।

पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने बड़े पुत्र मेघनाद को यह कह कर भेजा  कि: मारना नहीं उसे बाँध लाना । उस बंदर को देखा जाए कि क्या चीज़ है।

भाई के मारे जाने से गुस्साये , इंद्र को जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद, को आता देख  हनुमान्‌जी ने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसके प्रहार से मेघनाद का रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया।

हनुमान जी को बेकाबू  पाकर मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब हनुमान्‌जी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी।

ब्रह्मबाण लगते ही हनुमान वृक्ष से नीचे गिर पड़े  और मूर्छित हो गए हैं।  राम का दूत कहीं बंधन में आ सकता था ? किंतु प्रभु के कार्य के लिए हनुमान्‌जी ने स्वयं अपने को बँधा लिया। तब मेघनाथ उनको नागपाश से बाँधकर रावण की सभा में ले गया।

 

हनुमान्‌-रावण संवाद

रावण :

हनुमान्‌जी को नागपाश में बंधा देखकर, हंसा ठाके लगा कर रावण,

लंकापति ने कहा- रे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने उजाड़े वन,

क्या तूने कभी कानों से नहीं सुना मेरा यश और नाम,

किसकी शह पर राक्षसों को मारा,   क्या प्यारे नहीं हैं तुझे अपने प्राण।

 

हनुमान :

जो देवताओं की रक्षा हेतु ,नाना प्रकार की देह करते धारण

जो खर, दूषण, और बालि की मृत्यु का बने कारण ,

तुम्हारे जैसे मूर्खों को देते है शिक्षा ,

जिसकी पत्नी का हरण किया तूने मांगकर भिक्षा,

तेरे लिए हूँ यमदूत ,

श्री राम का हूँ मैं दूत ।

 

मुझे भूख लगी थी, इसलिए फल खाने का था मेरे मन ,

वानर स्वभाव के कारण नष्ट कर डाला तेरा हराभरा वन ,

तेरे पुत्र मेघनाथ ने तब छोड़ा नागपाश ,

बांध कर मुझे ले आया तेरे पास ।

 

 

हे रावण! मैं विनती करता हूँ, तुमसे हाथ जोड़कर

प्रभु की शरण में आ जाओ तुम अभिमान छोड़कर,

रामजी के चरण कमलों को हृदय में करो धारण,

लंका के विनाश का मत बनो तुम कारण ।

 

भ्रम को छोड़कर बन जाओ श्री राम भक्त ,

कुछ नहीं बिगड़ा अभी भी तुम्हारे पास है वक्त ,

वह जिनके डर से काल भी है डरता,

वापस करो शराफत से उनकी सीता ।

रावण :

सुन हनुमान्‌जी की भक्ति, ज्ञान, और नीति से सनी हित की वाणी ,

रावण हँसकर व्यंग्य से बोला , मिला हमें यह बंदर बड़ा गुरु ज्ञानी ,

फिर क्रोध से मस्तक उसका हो गया प्रचंड ,

सैनिकों को दिया उसने आदेश , दे दो इस वानर को मृत्यु दंड ।

 

सुनते ही रावण का आदेश ,सैनिक दौड़े उन्हें मारने,

उसी समय विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे बात को सँवारने ,

देख कर रावण को अत्यंत क्रुद्ध ,

विनयभाव से बोले , दूत को मारना है नीति के विरुद्ध ।  ,

 

 

 

लंकादहन

 

रावण ने विभीषण की नेक सलाह मानते हुए कहा : ठीक है! तेल में कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछ में बाँधकर फिर आग लगा दो जब बिना पूँछ का यह बंदर वहाँ राम के पास जाएगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आएगा।, मैं जरा उनकी सामर्थ्य तो देखूँ!

रावण के वचन सुनकर मूर्ख सैनिकों ने हनुमान की पूँछ में आग लगे दी । हनुमान्‌जी ने ऐसा खेल किया कि पूँछ लंबी हो गई। पूँछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। नगरवासी लोग तमाशा देखने आ गए । वे हनुमान्‌जी को पैर से ठोकर मारने और उनकी हँसी करने लगे ।

अग्नि को जलते हुए देखकर हनुमान्‌जी तुरंत ही बहुत छोटे रूप में हो गए।

बंधन से निकलकर वे भाग निकले । उल्टे उनकी पूँछ पर लिपटे हुए कपड़ों पर आग लगने से लंका सारी जल गई ।

 

लंका जलाने के बाद हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना

 

लंका जलाकर हनुमान्‌जी  सीता जी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! मुझे कोई चिह्न पहचान दीजिए, जैसे श्री राम ने मुझे दिया था ताकि राम जी विश्वास कर सके की मैं आपसे मिलकर आया हूँ  

तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी और कहा – यदि महीने भर में राम न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे- हे हनुमान्‌! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ!  तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात ।

हनुमान्‌जी ने सीता जी को समझाकर धीरज दिया और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर श्री रामजी के पास वापस चले ।

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