सीता हरण

 

सीता हरण:

मारीच ने रावण से पूछा –आप अकेले आए हैं, और आप बहुत चिंतित दिखते हो ।

रावण बोला :– राम –लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और कान काट डाले और खर –दूषण का वध कर डाला , मुझे बदला लेना है ।

मारीच: तुम बदला कैसे लोगे ?

रावण ने कहा—-तुम एक सोने के हिरण का रूप धारण करो, बाकी मैं देख लूँगा ।

तब मारीच ने कहा :राम –लक्ष्मण तो वही हैं जो विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए गए थे। उस समय उन्होने एक बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभर में सौ मील पर आ गिरा। उन शूरवीरों को ,जिसने ताड़का को मार दिया , शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण का वध कर डाला, उनसे  दुश्मनी मत लो । अपना इरादा त्याग कर वापस घर जाओ ।

यह सुनकर रावण आग बबूला हो गया और बोला : अरे मूर्ख! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो संसार में मेरे समान योद्धा कौन है ?.

तब मारीच ने सोचा रावण से बहस करने से कोई फायदा नहीं है , इसके अंदर गुस्सा है और हाथ मे शस्त्र, अगर इसकी बात नहीं मानी तो यह मुझे मार डालेगा,और अगर इसके कहने से मैं सोने के हिरण का रूप धारण कर लेता हूँ तो राम के हाथों मरूँगा । उसने सोचा राम के हाथों मारना ज्यादा अच्छा है।

ऐसा निर्णय लेकर वह रावण के साथ चला। रावण उसे  उस वन में ले गया जहां  राम –लक्ष्मण रहते थे, वहाँ पहुँच कर मारीच अपनी मायावी शक्ति से  सोने का हिरण बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, सोने का शरीर मणियों से जड़कर बनाया था। वो सीता जी की कुटिया के आस पास चक्कर काटने लगा ।

जब सीता जी ने इतना सुंदर सोने का हिरण देखा तो मुग्ध हो गई । वो राम से बोली :

सुनिए। उस सुंदर सोने के हिरण को मुझे लाकर दो

सीता की प्रेम पूर्वक रखी गई इस इच्छा को पूरा करने के लिए ,हिरन को देखकर श्री रामजी ने हाथ में धनुष लेकर उस पर बाण चढ़ाया और शिकार पर चलने को तैयार होने लगे । जाने से पहले उन्होने लक्ष्मणजी को समझाकर कहा- हे भाई! वन में बहुत से राक्षस वास करते है , तुम बस सीता का ध्यान रखना ,कोई विपत्ति आए तो अपने विवेक और बुद्धि बल से निर्णय लेना ।  मैं जल्द ही हिरण को लेकर वापस आता हूँ ।

रावण ने तो सब योजना पहले से ही बना रखी थी , राम को आता देखकर हिरण भाग चला।  रामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उस सोने के हिरण के पीछे दौड़ पड़े । वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता । इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ वह राम को कुटिया से दूर ले गया। अंत में  रामचन्द्रजी ने निशाना साधकर बाण मारा, जिसके लगते ही वो जमीन पर गिर पड़ा ।

गिरने से पहले वो राम की आवाज में चिल्लाया ‘हे लक्ष्मण , हे लक्ष्मण’ ,

प्राण त्याग करते समय उसने अपना राक्षसी शरीर प्रकट किया तब राम समझ गये की यह तो कोई मायावी चाल थी । उनको शक होने लगा  की कुछ तो गड़बड़ है । दुष्ट मारीच को मार कर फ़ोरन कुटिया कि ओर प्रस्थान किया ।

 

इधर जब सीताजी ने जब   ‘हे लक्ष्मण , हे लक्ष्मण’ की आवाज सुनी तो वो डर गयी और उन्होने लक्ष्मण से कहा : सुनो लक्ष्मण , राम किसी बड़े संकट में हैं वो तुम्हें पुकार रहे हैं । तुम शीघ्र जाओ, मुझे तो डर लग रहा है की उन पर क्या मुसीबत आन पड़ी है ।

लक्ष्मणजी ने कहा- हे माता! सुनो, राम तो सर्वशक्तिमान हैं वे क्या कभी स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं?

इस पर जब सीताजी ने लक्ष्मण को खूब खरी खोटी सुनाई और कहने लगीं,: तुम्हें राम से लगाव नहीं है तुम उसकी मदद के लिए क्यों नहीं जा रहे हो ?

सीता जी के, हृदय में चुभने वाले वचन सुनकर लक्ष्मण को  विवश होकर जाना पड़ा।  तब लक्ष्मणजी ने उस कुटिया के आगे एक लक्ष्मण रेखा खींच कर सीता से कहा :

आपकी आज्ञा के अनुसार मैं राम जी की मदद के लिए जा रहा  हूँ हालांकि राम अपने आप मे सक्षम हैं । आप इस कुटिया के अंदर ही रहना , इस रेखा से बाहर मत निकलना,जब तक आप इस लक्ष्मण रेखा के अंदर हैं कोई भी राक्षस इत्यादि आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता । 

 

 

 

 सीता हरण

रावण जो गिद्ध की तरह निगाहें लगाए बैठा था ,मौका देखकर संन्यासी के वेष में  सीताजी की कुटिया के समीप आया, उसने सीता जी से भिक्षा मांगी । रावण ने भिक्षा लेने के लिए जैसे ही अपना एक पैर हवा में उस लक्ष्मण रेखा को लांघने के लिए उठाया , आग कि एक  चिंगारी निकली और रावण ने तुरंत अपना पैर वापस खींच लिया । वो समझ गया कि यह तो लक्ष्मण रेखा है , इसे लांघना असंभव है ।

सीता जी उसे लक्ष्मण रेखा के अंदर से हे भिक्षा देने लगी तो वो बोला – यह तो सन्यासी का अपमान है , आप इस कुटिया से बाहर आकर भिक्षा देंगी तभी आपको  पुण्य मिलेगा ।

सीता जी ने कहा : मैं वचनबद्ध हूँ , हे सन्यासी बाबा, लक्ष्मण मुझे कसम  दे गए हैं की इस कुटिया के बाहर नहीं जाना है इसलिए मैं आपको हाथ जोड़ कर निवेदन करती हूँ कि आप अंदर से ही भिक्षा स्वीकार करें

रावण बोला – देवी , आप कि मंशा भिक्षा देने कि नहीं है , कोई बात नहीं मैं खाली हाथ ही वापस  चला जाता हूँ , पर ध्यान रखना एक सन्यासी का अपमान करने का पाप आप पर अवश्य चढ़ेगा, मैं तुम्हें श्राप दे दूंगा, तुम्हारा अनिष्ट हो जाएगा ।

संस्कारी होने के कारण सीता जी डर गयी , वैसे ही उनके दिमाग मे ‘हे लक्ष्मण , हे लक्ष्मण’ , की आवाजें गूंज रही थी ।

एक  सन्यासी का मान रखने के लिए , अपने अच्छे संस्कारों से विवश होकर सीता ने लक्ष्मण रेखा पार कर ली । सीता जी के लक्ष्मण रेखा पार करते ही आकाश में बिजली चमकी मानो कुछ अनिष्ट होने जा रहा हो । रावण तो इसी मौके की तलाश में था , उसने सीता जी को उठा लिया और अपने पुष्पक विमान में जबर्दस्ती बैठा कर आकाश मार्ग से चला।

सीताजी विलाप कर रही थीं- सीताजी का भारी विलाप सुनकर पेड़ पौधें, जीव, जन्तु , सभी दुःखी हो गए।  सीता जी यह भी पछतावा कर रही थी –लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है, मैंने तुम पर व्यर्थ क्रोध किया, तुम्हें भला बुरा कहा ,उसका फल पाया। वो रावण को चेता रही थी कि मेरे पति श्री राम तेरा वध करके मुझे तेरे चंगुल से मुक्त करा लेंगे। पर रावण कि तो मतिभ्रष्ट हो चुकी थी उसे तो जैसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था , उसका अहंकार चरम सीमा पर था , इसीलिए तो कहा है ‘विनाश काल विपरीत बुद्धि’ ।

 

जटायु-रावण-युद्ध,

बूढ़े जटायु ने सीताजी की चीख पुकार सुनकर पहचान लिया कि ये तो सीता जी हैं। उसने देखा कि रावण इनको जबर्दस्ती करके ले जा रहा है ।

वह पक्षी क्रोध से दौड़ा, उसने चोंचों से मार-मारकर रावण के शरीर पर घाव किए , तब रावण ने गुस्से में  अपनी तलवार निकाली और उससे जटायु के पंख काट डाले। जटायु पृथ्वी पर गिर पड़ा ।

सीताजी आकाश में विलाप करती हुई जा रही हैं। जैसे जाल में फँसी हुई कोई भयभीत हिरनी हो, पर्वत पर बैठे हुए बंदरों को देखकर सीताजी ने आभूषण और कुछ वस्त्र डाल दिये ।

इस प्रकार वह सीताजी को लंका ले गया ।

श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग,

इधर श्री राम ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को आते देखकर बहुत चिंता की और कहा- हे भाई! तुमने सीता को अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ चले आए । राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं। मुझे शंका हो रही है ,क्योंकि वो सोने का हिरण तो मायावी मारीच था । मेरे मन में ऐसा आता है कि सीता अवश्य किसी मुसीबत में है।

लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर कहा- आप फिकर न करें मैं सीता जी कि पर्याप्त सुरक्षा कर के ही आप के पास आया हूँ उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा , कोई राक्षक उनकी कुटिया में प्रवेश करने कि कोशिश करेगा तो जल कर भस्म हो जाएगा ,मैं ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच कर आया हूँ ।   

राम –लक्ष्मण वापस आश्रम पहुंचे । कुटिया मैं सीता जी को न पाकर वो दोनों स्तब्ध रह गए ।  कुटिया को सीता जी से रहित देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दुःखी हो गए। वे आवाजें  देने लगे : सीते! तुम कहाँ हो !

लक्ष्मण को बड़ा ताज्जुब हो रहा था कि वो लक्ष्मण रेखा खींच कर सीता से कहकर गया था कि  ‘आप इस कुटिया के अंदर ही रहना, इस रेखा से बाहर मत निकलना, जब तक आप इस लक्ष्मण रेखा के अंदर हैं कोई भी राक्षस इत्यादि आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता’। उसे अपनी शक्ति पर पूरा विश्वाश था कि जब तक सीता इस लक्ष्मण रेखा के अंदर हैं कोई भी राक्षस इत्यादि कुटिया में प्रवेश नहीं कर सकता । पर इस समय लक्ष्मण के पास कोई जवाब न था , वो बड़ी शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे , वो राम से आँखें नहीं मिला पा रहे थे ।

 

 

राम –लक्ष्मण दोनों अब सीता कि तलाश में निकल  पड़े ।

तब श्री रामजी लताओं और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चले,

हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों ! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है?

रामजी सीता को खोजते हुए इस प्रकार विलाप कर रहे थे कि पशु पक्षियों कि आँखों में भी आँसू आ गए ।

आगे जाने पर उन्होंने गरुड महाराज जटायु को पड़ा देखा। वह श्री रामजी का स्मरण कर रहा था, उन्होने उसके सिर पर अपना हाथ फेरा और उसकी तरफ बड़े ही करूँण द्रष्टि से देखा मानो उसके कटे हुए पंख और सिमटती सांस कुछ बयान करने को आतुर हो ।

राम के हाथों का स्पर्श पाकर उसकी सब पीड़ा जाती रही , तब धीरज धरकर जटायु ने कहा ‘प्रभु ! सुनिए, मैंने सीता जी का विलाप सुना था ,वो चीख चीख कर गुहार लगा रही थी , आपका नाम पुकार रही थी और वो यह भी चेता रही थी कि मेरे पति श्री राम तेरा वध करके मुझे तेरे चंगुल से मुक्त करा लेंगे । साथ मे यह भी कह रही थी कि लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है, मैंने तुम पर व्यर्थ क्रोध किया, तुम्हें भला बुरा कहा, तुम्हें राम कि सहायता के लिए भेजा, लक्ष्मण रेखा पार करके मैंने ही गलती कि ।

लक्ष्मण जो अभी तक इस अपराध बोध से ग्रसित थे कि उन्होने सीता को अकेले छोड़ कर महापाप किया है , जटायु के वचन सुनकर थोड़ा संतुलित हो पाये ।

जटायु ने एक बार फिर ज़ोर कि सांस लेकर कहा : प्रभु , रावण ने सीता जी को हर लिया है। मैंने उससे युद्ध किया और सीताजी को उसके चंगुल से छुड़ाने के लिए भरसक प्रयास किया , मैंने अपनी  चोंचों से मार-मार कर रावण के शरीर पर घाव किए।  रावण ने गुस्से में अपनी तलवार  से मेरे पंख काट डाले।, क्षमा करना प्रभु ,मुझे खेद है कि मैं आपकी पूरी सेवा न कर सका, मैं सीता को रावण से छुड़ा न सका । 

जटायु आगे बोला रावण  उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। हे भगवन ! आपके दर्शनों के लिए ही मैंने प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान! अब आज्ञा दो, ये चलना ही चाहते हैं, उसने कहा – मरते समय राम नाम मुख में आ जाने से महान्‌ पापी भी मुक्त हो जाता है, वही राम मेरे नेत्रों के सामने खड़े हैं। मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए ।

राम जी ने जटायु को कहा :

शरीर छोड़कर आप परम धाम में जाइए। मैं आपको क्या दूँ? आप तो सब कुछ पा चुके हैं, स्वर्ग जाकर,सीता हरण की बात आप जाकर पिता दशरथ से न कहिएगा

मैं  दशरथ पुत्र राम आज यह प्रण करता हूँ कि रावण को ऐसा दंड दूंगा कि वह सपरिवार परलोक सिधार कर स्वयं ही इसका प्रायश्चित करेगा ।  

जटायु ने देह त्यागकर परमधाम को चला गया । श्री रामचंद्रजी ने उसकी दाहकर्म आदि सारी क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथों से कीं ।

फिर दोनों भाई वन की सघनता से गुजरते हुए आगे बढ्ने लगे ।  वह सघन वन लताओं और वृक्षों से भरा है। उसमें बहुत से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्री रामजी ने रास्ते में कबंध राक्षस को मार डाला। उसने अपने शाप की सारी बात कही वह बोला- दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया

 

उधर सीताजी को लंका ले जाकर  रावण बहुत प्रकार से भय और प्रीति दिखलाकर वश मे करने के असफल प्रयास करता करता जब हार गया, तब उसने सीता को वृक्ष के नीचे अशोक वन में रखा ।

 

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