शूर्पणखा की कथा,

 

 

 

 

शूर्पणखा की कथा,

शूर्पणखा का खर-दूषण के पास जाना

राक्षसी शूर्पणखा  रावण की एक बहन थी, । वह एक बार पंचवटी में गई और राम व लक्ष्मण को देखकर मोहित हो गयी।  उसने एक  सुन्दर नारी का रूप धरा और  राम के पास जाकर और बोली

शूर्पणखा :न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री । मेरी और तुम्हारी  जोड़ी एक   दूजे के लिए ही बनी है । तुम मुझ से विवाह कर लो  ।

सीताजी की ओर देखकर श्री रामजी ने कहा : देखो, मेरे साथ तो मेरी पत्नी है इसलिए मैं तो तुम्हें अपना नहीं बना सकता , उधर मेरा छोटा भाई लक्ष्मण बैठा है चाहो तो ………………………..

तब वह लक्ष्मणजी के पास गई। लक्ष्मणजी उसे बोले- हे सुंदरी! सुन, मैं तो राम जी का सेवक हूँ , अतः तुम्हे क्या सुख  दे सकूँगा, हाँ  राम  समर्थ हैं,  राजा है, वे चाहे तो ………………………………….  

वह लौटकर फिर श्री रामजी के पास आई, प्रभु ने उसे फिर लक्ष्मणजी के पास भेज दिया। इस प्रकार दोनों  शूर्पणखा  को इधर से उधर नचाने लगे । निराश और क्रुद्ध होकर अंत में उसने अपना असली राक्षसी रूप प्रकट किया और सीता जी को मारने के लिए लपकी ।  उसका यह रौद्र रूप देखकर लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसके नाक-कान काट दिये ।  रावण की बहन का यह हाल करना  तो मानो रावण को चुनौती देना था –

वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गई और बोली- हे भाई! तुम्हारे पौरुष, वीरता और बल सबको धिक्कार है ।

खर-दूषण : आखिर हुआ क्या है ? हमारे रहते किसने तुम्हारे नाक और कान काटने की जुर्रत की ।

शूर्पणखा  : पंचवटी में राम और लक्ष्मण  नाम के दो भाई रहते है ,उन्होने मेरा यह हाल किया है ।

खर-दूषण : मगर क्यो ?

शूर्पणखा :  वो अपने आप को इस जंगल का राजा समझते हैं , और जब मैंने उनसे कहा की मैं खर-दूषण की बहन हूं तो उन्होने मेरा यह हाल कर दिया

सब सुनकर खर –दूषण आग बबूला हो गए  , उन्होने राक्षसों की एक  सेना तैयार की। राक्षस समूह, झुंड के झुंड में  भयानक हथियार लेकर पंचवटी की ओर  दौड़े । वो  गरजते हुए , ललकारते हुए की दोनों भाइयों को जिंदा पकड़कर मार डालो और उनकी स्त्री को छीन लो की उद्धघोषणा करते हुए पंचवटी आश्रम पहुँच गए ।

शत्रुओं की सेना समीप देखकर राम और लक्ष्मण  धनुष चढ़ाकर ,कमर में तरकस कसकर, आश्रम के बाहर आकार खड़े हो गए ।

खर-दूषण के नेत्रत्व में राक्षस योद्धा ‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए बड़ी तेजी से दौड़े हुए आए और फिर ,

खर–दूषण बोले: तुमने  हमारी बहन के नाक और कान काटने की हिम्मत कैसे  की?

लक्ष्मण : यह तो आप अपनी बहन से ही पूछ लो ।

खर- दूषण बोले:   या तो तुम दोनों मरने के लिए तैयार हो जाओ  या फिर तुम ‘छिपाई हुई अपनी स्त्री’ हमें तुरंत दे दो तो हम तुम्हें छोड़ देंगे ।

लक्ष्मण बोले:-   हम  वन में तुम्हारे सरीखे दुष्टो को  ही तो ढ़ूँढते फिरते हैं। हम काल से भी लड़ सकते हैं। अगर तुम लोगो में दम खम है तो लड़ों ,नहीं है तो घर लौट जाओ। युद्ध में पीठ दिखाने वालों को मैं नहीं मारता।

खर-दूषण  चिल्लाये : इनको पकड़ लो और कैद कर लो । यह सुनकर भयानक राक्षस बाण, धनुष, और फरसा धारण किए हुए राम –लक्ष्मण की तरफ  दौड़ पड़े ।    

राम-,लक्ष्मण ने उनके हथियारों को टुकड़े-टुकड़े  करके काट डाला। फिर अपने भयानक बाण चलाये जिन्हे देख कर ऐसा लग रहा था मानो प्रलय आ जाएगी ।   तीक्ष्ण बाणों को देखकर राक्षस पीठ दिखाकर भाग चले।  अंततः खर-दूषण का वध हुआ । 

शूर्पणखा रावण के पास पहुंची ,

खर-दूषण की मौत के बाद  शूर्पणखा ने जाकर रावण को भड़काया। रावण की सभा के बीच वह व्याकुल होकर विलाप करके रोने लगी-

शूर्पणखा को देख लंकापति रावण ने कहा

रावण : किसने तेरे नाक-कान काट लिए?

शूर्पणखा बोली-  अयोध्या के राज कुमार राम –लक्ष्मण वन में शिकार खेलने आए हैं।  लक्ष्मण ने मेरे नाक-कान काट लिए?

रावण : उनकी यह मजाल ।

 शूर्पणखा : वो तो यहाँ तक कह रहे थे वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे। मैं तेरी बहन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी उड़ाने लगे। वे देखने में तो बालक हैं, पर हैं काल के समान।  उनके साथ एक सुंदर स्त्री भी है। मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आए पर उन्होंने खर-दूषण को भी मार डाला।

खर-दूषण का वध सुनकर रावण का पारा सातवें आसमान पर था । उसने शूर्पणखा को अपने चिर परिचित अंदाज में शेख़ी मारते हुए कहा  

रावण :  उनकी यह हिम्मत , देखना मैं उन दोनों को युद्ध में हराकर उनका वध कर दूंगा और उनकी स्त्री को लंका ले आऊँगा ।

पर रात भर रावण मन ही मन यह सोचता रहा कि खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें कौन मार सकता है?

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