कैकेयी का कोप भाजन

कैकेयी का कोप भाजन

 

बड़े खुश  होकर राम का राजतिलक करने का फैसला सबसे पहले कैकेयी को सुनाने के लिए

राजा दशरथ ने कैकेयी के महल मे प्रवेश किया  तो पाया की कैकेयी तो अपने कोप भवन में है ।

दशरथ:–   किस लिए रूठी हो?’  यह कहकर कैकेयी का हाथ पकड़ते है ।

कैकेयी:  उनके हाथ को झटककर हटा देती है और गुस्से से देखती है ।

दशरथ:-   क्यों नाराज हो कुछ तो बताओ ।  किसी ने कुछ कहा है क्या ।

कैकेयी गुस्से से देखती है  –आपको क्या ?

दशरथ बड़े खुश  होकर कहते हैमैं कल ही राम का राजतिलक कर रहा हूँ  ।

कैकेयी का  मुंह गुस्से से लाल हो गया –– तो मैं क्या करूँ

दशरथ:-    तुझे क्या चाहिए माँग ले ,  राम की  कसम मना नहीं करूंगा ।  

यह सुनकर कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी,

दशरथ:-  मैं कल ही राम का राजतिलक कर रहा हूँ  ।

यह सुनते ही कैकेयी का कठोर हृदय फटने लगा। फिर भी वह ऊपर से प्रेम दिखाकर हँसती हुई बोली:-

आप माँग ले -माँग ले तो कहा करते हैं, याद है एक बार  आपने दो वरदान देने को कहा था, पता नहीं वो भी दोगे या नहीं।

दशरथ ने हँसकर कहा कि

अब मैं तुम्हारा मतलब समझा । तुमने उन वरों को धरोहर रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मैं भी भूल गया । चलो अब फटाफट मन लो  । चाहे दो के बदले चार माँग लो। रघुवंशी हूँ मना नहीं करूंगा । तुम तो जानती हो –

 रघुकुल  रीति सदा चली आई ,

प्राण  जाएँ, पर वचन न जाए ।  

कैकेयी:  तो फिर सुनिए,

पहले  वर से तो दीजिए, भरत को राजतिलक और

दूसरा वर में  राम को चौदह वर्ष का वनवास ।

यह सुनकर राजा दशरथ के तोते उड़ गए ।

माथे पर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा सोचने लगे। , सब कुछ लुट गया ।

राजा का ऐसा बुरा हाल देखकर कैकेयी मन में बुरी तरह से क्रोधित हुई। और बोली-

कैकेयी:  क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मैं आपकी रानी नहीं हूँ  जो मेरी मांगे सुनते ही आपको तीर की तरह लगी ।

 वरदान नहीं देने हैं तो न  कर दीजिए । आप ही बड़ी शान से कहते थे-

 रघुकुल  रीति सदा चली आई ,

 प्राण  जाएँ, पर वचन न जाए । 

कैकेयी जले पर नमक छिड़क रही थी ।

राजा दशरथ ने धीरज धरकर नेत्र खोले , प्रचंड क्रोध से जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखाई पड़ी, मानो आग की लपटे हों और सोचा- यह मुझे जीते जी मर डालेगी , फिर भी  राजा ने बड़ी हिम्मत करके, कैकेयी को मनाते हुये बोले-

दशरथ:-   मेरी नजर में तो राम और भरत मेरी  दो आँखें हैं, फिर भी अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो  शुभ मुहूर्त निकलवा कर , मैं भरत को राज्य दे दूँगा । पर यह तो बता की राम को वनवास क्यों ? राम का अपराध तो बता । तू स्वयं भी राम को कितना प्यार करती थी ।  क्रोध छोड़ दे और सोच विचारकर कोई दूसरा वर माँग ले , राम के बिना मेरा जीवन नहीं है।

राजा की बातें सुनकर कैकेयी सुलग उठी  (कैकेयी कहती है-)

कैकेयी:     मैंने जो माँगा है सो दीजिए, नहीं तो मना कर दीजिए। मुझे  नाटक नहीं पसन्द। अगर सवेरा होते ही मुनि का वेष धारण कर राम वन को नहीं जाते, तो समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपकी बदनामी ।

ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, ।

राजा ने कैकेयी के चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि:

दशरथ:-   तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ । पर राम के विरह में मुझे मत मार। तू राम को वनवास मत दिला ।

राजा ने देखा कि कैकेयी मानने वाली नहीं है :

तब वे राम, राम, कहते हुए सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े , उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया,  कंठ सूख गया, मुख से बात नहीं निकलती, मानो पानी के बिना  मछली तड़प रही हो ।

कैकेयी फिर बोली,

कैकेयी:- जो अंत में ऐसा ही करना था, तो आपने ‘माँग, माँग’ किस बूते पर कहा था ? अब असहाय स्त्री की भाँति रोइए-पीटिए नहीं।

कैकेयी के कटु शब्द सुनकर राजा ने कहा की :

दशरथ:-   भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। तेरी ही बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है । अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर, मेरे सामने से दफा हो जा , मुझे अपनी शक्ल भी मत दिखाना ।

और यह कहकर कि अरी अभागिनी! तू अन्त में पछताएगी ।

जमीन पर गिर पड़े।

कैकेयी कुछ नहीं बोली , मौन धरण किए रही ।

दशरथ रात भर ‘राम-राम’ रटते  रहे हैं और इस तरह विलाप करते-करते  सवेरा हो गया ।

सुबह ,राजदबार  में मंत्री गण  राजा का इंतज़ार कर रहे थे और आश्चर्य कर रहे थे की रोजाना टाइम से आने वाले महाराज आज अभी तक क्यों नहीं पधारे । अंत मे  महामंत्री  कुशल क्षेम पूछने राजमहल में गए, पर महल का सन्नाटा देखकर वे सहम गए ,ऐसा लग रहा मानो कुछ अनिष्ट हो गया हो , पूछने पर कोई जवाब नहीं देता। वे उस महल में गए, जहाँ राजा और कैकेयी थे । देखा कि राजा के चेहरे का रंग उड़ गया है और वो जमीन पर मुरझाए पड़े हैं।  मंत्री मारे डर के कुछ पूछ नहीं सके ।  इस बीच कैकेयी बोली:

 राजा रातभर से ‘राम राम’ की रट लगाए हैं , रात भर सोये भी नहीं , ईश्वर  जानें इन्हे क्या हो गया है ।  तुम जल्दी राम को बुला लाओ।

महामंत्री सोच से व्याकुल वापस  आए वो  सीधा रामचन्द्रजी के पास गए और उन्हे अपने साथ महल ले गए ।  रामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा बुरी हालत में पड़े हैं, मानो सिंहनी को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो,राजा के होठ सूख रहे हैं , पास ही क्रोध से भरी कैकेयी को देखा, मानो साक्षात मृत्यु ही बैठी राजा के जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रही हो॥

 

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