धूप में चला

जब भी धूप मे चला, सर उठाकर चला ।

इस तरह से ही चाँदनी मैं तुझमे न ढला ।

हमारी बात पर चलते पत्थर तब तक यकीन न करे,

जब तक कदमो तले तक न आ जाए लावा पिघला ।

ये चमक दमक, ये रोशनी भरा शहर हर तरफ,

शोहरत की चमक में आदमी भूला है कफन उजला ।

इंसान तो बस हालातो से  सुलह चाहता है,

और जिंदगी गीत गाती है “लड़! बढ! रख हौसला।”

चल कभी तेरी भी सोहबत करेंगें  ‘अमित’  ,

हमे भी दिखता हैं जिंदगी के इरादो में घपला ।

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