एक मुठ्ठी भूख !

मुझे  भूख   नहीं  है  ,
नहीं  चाहिए मुझे  रोटी  !
प्यासा नहीं हूँ मैं !
पानी भी  नहीं चाहिए ;
कोई दे सके तो दे मुझे ;
एक   मुठ्ठी   भूख !
और एक चुल्लू  प्यास!
भूख वो जो आदमी को
बनता है आदमी !
प्यास वो जो सिखाती है
आदमी को आदमियत !
मैं लौट जाना चाहतो हूँ ;
फिर उसी बर्बरता के युग में !
जहाँ आदमी होता था नंगा ;
नहीं पहनता था कपडे !
और नहीं झांकता था वो ;
कपड़ों में ढके , अनढके तन को !
भूखा होता था आदमी ;
पर कभी नहीं खता था
आदमी, आदमीं को !
नहीं पीता था तब कभी ;
प्यासा आदमी भी
आदमी के खून को !

3 Comments

  1. Bhavana lalwani 11/09/2013
  2. राजेश चोहान 13/09/2013
  3. Gunjan Upadhyay Gunjan Upadhyay 17/09/2013

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