आदमी है तो जिंदगी में जरुर बीकता है !

कभी जनता, कभी सरकार बीकता है  !
कभी कुर्सी , कभी दरबार बीकता है  !
हर चीज है यहाँ बिकाऊ दोस्तों ;
कोई छुप कर कोई सरेबाजार बीकता है  !
 
कभी सहर-सहर ,कभी गाँव-गाँव बीकता है  !
कोई किलो-किलो ,कोई पाव-पाव  बीकता है  !
हर चीज की अलग-अलग कीमत है मित्रों;
कोई कौड़ियों में,कोई करोडो के भाव बीकता है  !
 
कही खून, कहीं पसीना आज बीकता है  !
कहीं पत्थर कहीं सोना कही ताज बीकता है  !
सब कुछ तो लोग खरीदते है यारों ;
तभी तो माँ-बहनों का लाज बीकता है  !
 
कही खस्सू, कही  खुजली, कही दाद बीकता है  !
कभी दवा , कभी दारू, कभी इलाज बीकता है  !
लोकतंत्र हो जाता है बीमार मेरे साथी ;
जब अखबार वालों का आवाज बीकता है  !
 
कोई ख़ुशी-ख़ुशी, कोई होकर मजबूर बीकता है  !
कोई आपनो के लिए,कोई होकर दूर बीकता है  !
तकदीर के तराजू में तूल जाता है हर आदमी 
 आदमी है तो  जिंदगी में जरुर बीकता है  !

        

                                मथुरा  प्रसाद  वर्मा ‘प्रसाद’

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