गीत – रोटी से मँहगा प्याज़

रोटी से मँहगा प्याज़

रोटी से मँहगा अब
बिकता है प्याज़,
परत परत छिलके-सी
उतर रही लाज ।

रामधनी खीज रही
चूल्हे के सँग,
दिन भर की भूखी है
उघडा है रँग,
पीसेगी लहसुन की
चटनी फिर आज ।

ग़ुरबत की पाकिट में
लाखों हैं छेद,
वर्षा ने टप्पर के
खोल दिए भेद,
इस महिनें टूटेगी
जचगी की गाज ।

सरकारी वादों की
खूब खुली पोल,
पीट रहे नेता अब
संसद में ढोल,
मँहगाई पलटेगी
अब तख्तोताज ।
***

• रजनी मोरवाल
सी-२०४, संगाथ प्लेटीना,
साबरमती-गाँधीनगर हाईवे,
मोटेरा, अहमदाबाद – ३८०००५
मो.०९८२४१६०६१२

One Response

  1. Devendra Kumar 19/10/2013

Leave a Reply