कलयुग

दुराग्रह मिथ्या का ,सत्य से युद्ध का

सेना प्रपंच की ,सेनापति अन्याय का

दुष्कर्मों के अश्व-गज ,कुतर्कों के शश्त्रहैं

नग्नता के वस्त्र धारित ,अहं के सैनिक है

दुर्भावना की दुन्दुभी ,दंभ की हुंकार है

अज्ञानता का रथ लिये,हिंसा की तलवार है

आराधना अधर्म की ,अर्थ का प्रसाद है

छदम मन्त्र हो गया ,अन्याय की जयकार है

न्याय नीतिबंध गये,सत्य गया हारहै

मिथ्या हुंकारती ,अधर्म की जयकार है

अभिषेक देखो राज्य में हो रहा अधर्म का

मिथ्या बनी सेनापति ,दंभ मंत्री है बना

दुर्बुद्धि का कोहरा घना,छाया है इस संसार में

पशु है नहीं पशुवत बने ,हम स्वार्थ के उपकार में .

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