‘स्मृति ‘

उस ओर गावं के स्कूल हमारा था

छोटी -छोटी पगडण्डी से

पीले -पीले सरसों के खेतों से

सूने -सूने जंगल में चल

कुछ पेड़ों के बीच ,तालाब किनारे स्कूल हमारा था .

लकड़ी की पाटी ,मिट्टी का बूदिका

एक ओर घुली खड़िया ,एक ओर घुली करिखा

पाटी को काले रंग से रंग

सेंठो ,नरकुल से बनी कलम

अ ,आ ,इ,ई लिखता रहता, सबसे मैं कहता रहता

उस ओर गावं के स्कूल हमारा था ………………………१

धरती पर बिछी टाट फट्टी

हम पंक्ति बद्ध बैठा करते

दीनू ,मंगू ,छैया ,भोलू ,

हम लिपट झपट खेला करते

घंटी बजती जब अपराहन

टन-टन कर भूख जगाती थी

सूखा सालन ,मोटी रोटी ,हर्षित मन को कर जाती थी

अब स्मृति में रमता रहता ,उस ओर गावं के स्कूल हमारा था ……..२

मुन्शीजी भूगोल पढाकर ,विश्व भ्रमण करवाते थे

भारत है सिरमौर विश्व का ,बार -बार कहलाते थे

जब समय गणित का आता था ,तब काँप ह्रदय तक जाता था

पंडितजी की पतली डंडी ,अनगिनत बार खा जाता था

हर बार पहाडा तेरह का ,स्मरण नहीं रह पाता था

घंटी बजती जब छुट्टी की ,मन बाग -बाग  हो जाता था

दीनू ,मंगू ,छैया ,भोलू संग सरपट दौड़ लगाताथा

जब गावं पहुँचता यह कहता ,उस ओर गावं के स्कूल हमारा था ……३

पंडितजी ने ,मुंशी जी ने जो शिक्षा संस्कार डाले

उस बचपन से युवा -पन तक ,आदर्श मानकर हैं पाले

है नमन करूँ मैं कोटि-कोटि ,आराध्य रहेंगे जीवनभर

हम आज स्मरण करते हैं उन गुरुओं का अभिनन्दन कर ….४ .

 

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