मन

मन बावरा थोड़ा पागल सा है

दिशा का इसको कोई ज्ञान नहीं

कभी ये सख्त कभी पिघलता मोम सा है

खुद पर इसका कोई ध्यान नहीं

हलकी सी एक चोट से कभी

मोती की तरह बिखरने लगता है

झूटी दुनिया की तपिश में कभी

एक ज्योत की तरह जलने लगता है

मूड जाता है उस ओर जहाँ कोई

थोडा अपना सा लगता है

कभी रुक जाता है उस मोड़ पर

जहाँ सब सपना सा लगता है

मन बावरा थोडा पागल सा है

– प्रीती श्रीवास्तव

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  1. chirag raja 20/01/2015

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