जब कोई क्षण टूटता

वह
मेरी सर्वत्रता था
मैं
उसका एकान्त-
इस तरह हम
कहीं भी अन्यत्र नहीं थे ।

जब
कोई क्षण टूटता
वहाँ होता
एक अनन्तकालीन बोध
उसके समयान्तर होने का
मुझमें ।

जब
कोई क्षण टूटता
तब मेरा एकान्त
आकाश नहीं
एक छोटा-सा दिगन्त होता
उसके चारों ओर ।

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