शायरी

चुप रहूँ बेताब सा न कह सकूँ न सह सकूँ,
इस दिल की बेकरारी में भी मैं मगर न बह सकूँ’
नब्ज़ को पहचान लेतीं काश वो जो खास हैं,
ताकि जिंदा पल दो पल को मैं ख़ुशी से रह सकूँ .
                                 :- सुहानता ‘शिकन’

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